Wednesday, November 28, 2018

मैं भारतीय हूं और हमेशा भारत का साथ देता रहूंगा

नेशनल कॉन्फ्रेंस नेता और जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला कश्मीर मसले के हल में नाकामी को स्वीकार करते हैं.

बीबीसी हिंदी से ख़ास बातचीत में उमर ने कहा, ''कश्मीर की हालत के लिए ज़िम्मेदार केवल हमारी पार्टी ही नहीं बल्कि सब हैं. इनमें 'नई दिल्ली और इस्लामाबाद' भी शामिल हैं.''

पिछले दिनों पीडीपी और कांग्रेस के साथ सरकार बनाने के दावे में नाकामी और विधानसभा के भंग होने के बाद उमर अब्दुल्ला कश्मीर के मसले को सुलझाने में सियासी पार्टियों की भूमिका पर गहराई से रौशनी डालने के मूड में थे.

उमर अब्दुल्ला ने कहा, "हम सब ज़िम्मेदार हैं. कहीं ना कहीं हम सब से ग़लती हुई होगी. सभी नाकाम रहे हैं.''

दक्षिण कश्मीर में सुरक्षाबलों और चरमपंथियों के बीच रोज़ की झड़पों का हवाला देते हुए उमर कहते हैं कि कश्मीर में हालात बिगड़ते जा रहे हैं.

हालात साज़गार नहीं...'
उमर अब्दुल्ला कहते हैं, "कश्मीर में हालात साज़गार (अनुकूल) नहीं हैं. अगर मैं ये कहूँ कि हालात साज़गार हैं तो ग़लत होगा."

उमर अब्दुल्ला की तरह उनके दादा शेख़ अब्दुल्ला राज्य के मुख्यमंत्री रहे. पिता फ़ारूक़ अब्दुल्ला भी पाँच बार राज्य के मुख्यमंत्री रहे.

नेशनल कॉन्फ्रेंस बीते 70 सालों में सबसे ज़्यादा वक़्त तक सत्ता में रही.

तो क्या इस नाकामी में नेशनल कॉन्फ्रेंस सब से बड़ी भागीदार नहीं है?

उमर अब्दुल्ला ने बीबीसी ने कहा, "अलग-अलग लोग इसको अलग-अलग अन्दाज़ में लेंगे. मैं सारी ज़िम्मेदारी अपने सिर पर नहीं लूँगा. हम क़सूरवार हैं लेकिन सब से ज़्यादा क़सूर तो नई दिल्ली और इस्लामाबाद का है."

भारत और पाकिस्तान के बँटवारे के साथ कश्मीर का मुद्दा विवादों में है.

तब से कश्मीर के एक हिस्से पर प्रशासन भारत का है और एक पर पाकिस्तान का. इस मुद्दे को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच तीन युद्ध भी हो चुके हैं.

हर बार बातचीत फ़ेल
इस मसले के हल के लिए दोनों देशों के बीच कई राउंड की बातें हुई हैं, लेकिन पिछले कई सालों से बातचीत खटाई में पड़ी है.

उधर भारत प्रशासित कश्मीर में अलगाववादी हुर्रियत कॉन्फ़्रेन्स भी बातचीत में हिस्सा लेने की दावेदार है.

अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह के दौर में भारत सरकार ने हुर्रियत के नेताओं से बातचीत का सिलसिला शुरू किया था लेकिन इसका कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकल सका.

सियासी विशेषज्ञों के मुताबिक़, निर्वाचित सरकार की ग़ैर हाज़िरी में एक राजनीतिक अनिश्चतता पैदा हो गई है जिससे चरमपंथियों को और भी हवा मिलेगी.

श्रीनगर की सड़कों पर आम लोगों ने कहा कि निर्वाचित सरकार के ना होने से उनकी रोज़ की समस्याएँ और भी बढ़ेंगी.

ऐसे में पिछले हफ़्ते नॉर्वे के पूर्व प्रधानमंत्री केजेल मैग्ने बोन्डेविक का घाटी में आना और हुर्रियत के नेताओं से मुलाक़ात करना काफ़ी अहम माना जा रहा है.

उमर अब्दुल्ला इसे एक महत्वपूर्ण घटना मानते हैं.

नॉर्वे के पूर्व प्रधानमंत्री केजेल मैग्ने बोन्डेविक पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर भी गए और हालात का जायज़ा लिया. इस दौरे का उमर अब्दुल्ला स्वागत तो करते हैं लेकिन हैरानी भी जताते हैं.

उन्होंने कहा, "केंद्रीय सरकार हुर्रियत कॉन्फ्रेंस से बात नहीं कर रही, उसे अलग-थलग कर रखा है. अगर इससे हुर्रियत कॉन्फ्रेंस को मेज़ पर लाने में क़ामयाबी मिलती है तो सभी को इसका स्वागत करना चाहिए."

Monday, November 26, 2018

कच्चा तेल 25 फीसदी सस्ता, उपभोक्ता को सिर्फ 7-10 फीसदी फायदा जानें क्यों?

पिछले एक महीने से ज्यादा समय से भारत में पेट्रोल और डीजल के भाव घटने का सिलसिला जारी है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में एक महीने से अधिक समय से गिरावट दर्ज हो रही है. सस्ते हुए पेट्रोल-डीजल से जहां वाहन चालकों व आम उपभोक्ताओं को महंगाई से थोड़ी राहत मिली है वहीं बड़ी राहत अभी भी केन्द्र सरकार और सरकार तेल कंपनियों के बीच फंसी है.

बीते एक हफ्ते से पेट्रोल और डीजल की कीमत में रोज कटौती हुई है. इंडियन ऑयल की वेबसाइट के अनुसार, दिल्ली, कोलकाता, मुंबई और चेन्नई में सोमवार को पेट्रोल के भाव क्रमश: 74.49 रुपये, 76.47 रुपये, 80.03 रुपये और 77.32 रुपये प्रति लीटर दर्ज किए गए. वहीं चारों महानगरों में डीजल की कीमतें क्रमश: 69.29 रुपये, 71.14 रुपये, 72.56 रुपये और 73.20 रुपये प्रति लीटर दर्ज की गईं।

तेल विपणन कंपनियों ने सोमवार को दिल्ली, कोलकाता और मुंबई में पेट्रोल के दाम में 35 पैसे प्रति लीटर, जबकि चेन्नई में 37 पैसे प्रति लीटर की कटौती की. वहीं, डीजल कीमतों में दिल्ली और कोलकाता में 41 पैसे, जबकि मुंबई और चेन्नई में 43 पैसे प्रति लीटर की कटौती की गई है.

अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तीन अक्टूबर के बाद ब्रेंट क्रूड के दाम में 30 फीसदी से ज्यादा जबकि अमेरिकी लाइट क्रूड वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट यानी डब्ल्यूटीआई के भाव में करीब 33 फीसदी की कमी आई है. अंतर्राष्ट्रीय वायदा बाजार इंटरकॉन्टिनेंटल एक्सचेंज यानी आईसीई पर ब्रेंट क्रूड का जनवरी डिलीवरी वायदा सोमवार को पिछले सत्र के मुकाबले 0.46 फीसदी की बढ़त के साथ 59.26 डॉलर प्रति बैरल पर बना हुआ था. वहीं, न्यूयार्क मर्केंटाइल एक्सचेंज यानी नायमैक्स पर डब्ल्यूटीआई का जनवरी डिलीवरी वायदा अनुबंध 0.48 फीसदी की बढ़त के साथ 50.66 डॉलर प्रति बैरल पर बना हुआ था.

महंगे पेट्रोल-डीजल का असर, खुदरा के बाद थोक महंगाई भी बढ़ी

बाजार के जानकार बताते हैं कि कच्चे तेल के दाम फिलहाल उठाव की संभावना कम दिख रही है, जबकि इस बात की प्रबल संभावना है कि 6 दिसंबर को वियना में ऑर्गेनाइजेशन ऑफ पेट्रोलियम एक्सपोर्टिग कंट्रीज यानी ओपेक की बैठक में सउदी अरब तेल की आपूर्ति घटाने पर जोर डालेगा है.

अक्टूबर से अबतक घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल की कीमत 7-11 फीसदी लुढ़क चुके हैं वहीं अंतरराष्ट्रीय बाजार में इस दौरान कच्चा तेल 25-30 फीसदी गिर चुका है. आंकड़ों के मुताबिक 3 अक्टूबर को एक बैरल कच्चा तेल 87 डॉलर था वहीं बीते हफ्ते 60 डॉलर प्रति बैरल के  नीचे पहुंच गया है. कच्चे तेल की कीमत में यह गिरावट ईरान से तेल खरीदने के प्रतिबंध में कुछ देशों को अमेरिका द्वारा मिली छूट और अमेरिका समेत रूस और साउदी अरब द्वारा अधिक उत्पादन के चलते हुई है. खासबात है कि दुनियाभर में पेट्रोल-डीजल की कीमत को निर्धारित करने के लिए अहम सिंगापुर बेंचमार्क पर इस दौरान पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 26 और 25 फीसदी क्रमश: कटौती दर्ज हुई है.

नेहरू इंदिरा रहे नाकाम, क्या PM Modi बनाएंगे भारत को P-6?

गौरतलब है कि देश में रीटेलर के लिए पेट्रोल और डीजल की कीमत सरकार तेल कंपनियां करती है. इसे निर्धारित करने में सरकारी कंपनियां ग्लोबल मार्केट में बीते 15 दिनों के औसत स्तर को आधार बनाती हैं. इसके बाद तेल कंपनियां पेट्रोल-डीजल की कीमत तय करने के लिए अंतरराष्ट्रीय एक्सचेंज रेट, फ्रेट चार्ज और इंश्योरेंस खर्च समेत अन्य खर्चों को जोड़कर करती हैं.

इस कीमत पर रीटेलर को पेट्रोल-डीजल दिए जानें के बाद केन्द्र और राज्य सरकारों का टैक्स और रीटेलर का कमीशन जोड़कर उपभोक्ता के लिए प्रति लीटर पेट्रोल-डीजल की अंतिम कीमत निर्धारित होती है. हालांकि पेट्रोल-डीजल की कीमतें बीते चार वर्षों से बाजार भरोसे लेकिन सरकारी तेल कंपनियां अंतिम कीमत निर्धारित करने का पूरा फॉर्मूला घोषित नहीं करती और जानकारों का मानना है कि तेल कंपनियां अपने मुनाफे को सुरक्षित रखने के लिए ऐसा करती हैं.

Tuesday, November 13, 2018

टिकट कटते ही वसुंधरा के मंत्री भड़के, कहा- BJP को कर दूंगा बर्बाद

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को समर्पित कार्यकर्ताओं की पार्टी कहा जाता है, लेकिन अगर टिकट न मिले तो काहे का पार्टी और काहे का समर्पण. पांच साल तक वसुंधरा सरकार में भारी-भरकम मंत्रालय संभालने वाले कैबिनेट मंत्री सुरेंद्र गोयल का टिकट क्या कटा, उनका बीजेपी से मोह भी भंग हो गया.

मंत्री जी के समर्थकों ने खुलेआम बीजेपी के कमल के निशान वाले झंडे को जलाया और बीजेपी मुर्दाबाद के नारे लगाए. मंत्री जी भी समर्थकों के गुस्से को देख अपना धैर्य खो बैठे और कहा कि उनके साथ धोखा हुआ है. सुरेंद्र गोयल ने कहा, 'बीजेपी के जिस वटवृक्ष को खड़ा किया है उसे उखाड़ कर फेंक दूंगा. पाली जिले के जैतारण विधानसभा के जिस सीट पर मैंने कमल खिलाया है, उस कमल को तोड़ फेकूंगा.'

दरअसल, सुरेंद्र गोयल बीजेपी के कद्दावर नेताओं में से रहे हैं और जैतारण सीट से 4 बार जीत चुके हैं. लेकिन इस बार अचानक उनका टिकट कटने से उनके समर्थक नाराज हो गए. माना जा रहा है कि इस बार जैकारा में जो दंगे हुए थे उसे शांत कराने में सुरेंद्र गोयल नाकाम रहे. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इनकी भूमिका को लेकर बेहद नाराज था. उन्हें संघ की नाराजगी का नुकसान झेलना पड़ा है .

मंत्री जी ने कहा है कि पार्टी ने उनके साथ धोखा किया है. उन्हें 2 दिन पहले बुलाते तो अपने कार्यकर्ताओं को समझा सकते थे. गोयल ने कहा, 'इज्जत बचाने के लिए मैं कहता कि मेरी तबीयत ठीक नहीं है, इसलिए चुनाव नहीं लड़ूंगा. मेरा टिकट इसलिए काट दिया क्योंकि मैं किसी की चापलूसी नहीं करता.' उन्होंने कहा कि सबको ऐसा लगता है कि मैं संघ का विरोधी हूं. इसलिए  मौका पाते ही मेरे विरोध में उम्मीदवार खड़ा कर दिया गया.' बीजेपी को खत्म करूंगा की धमकी देते हुए गोयल ने कहा कि पार्टी नेताओं की अक्ल ठिकाने ला दूंगा.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने एक दिन पहले घोषणा की थी कि वो 25 नवंबर को अयोध्या में राम मंदिर मुद्दे पर जनाग्रह रैली का आयोजन करेगा. उसी दिन शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे भी राम मंदिर निर्माण मुद्दे पर जोर देने के लिए अयोध्या पहुंच रहे हैं. आरएसएस की ओर से 25 नवंबर को ही अयोध्या में रैली का आयोजन शिवसेना को रास नहीं आया है.

कई पार्टियों का मानना है कि 2019 लोकसभा चुनाव में राम मंदिर बड़ा मुद्दा बनने जा रहा है. इसी मुददे पर आरएसएस की ओर से 25 नवंबर को अयोध्या में जनाग्रह रैली के आयोजन को विश्व हिन्दू परिषद का भी समर्थन है. ऐसी रैलियों का आयोजन नागपुर और बेंगलुरु जैसे शहरों में भी होगा. इनमें हजारों साधु-संतों के हिस्सा लेने की भी संभावना है. 25 नवंबर को ही शिवसेना अयोध्या में बड़े आयोजन की तैयारी कर रही है. 

शिवसेना के मुखपत्र सामना में पार्टी ने आरएसएस की जनाग्रह रैली की तारीख को लेकर कई सवाल किए है. लेख में कहा गया है, ‘इस जनाग्रह रैली से कुछ नहीं होने वाला. अगर ऐसी सूखी रैली से राम मंदिर निर्माण में मदद मिलती तो 25 साल पहले इतने सारे कारसेवकों को अयोध्या में जान ही क्यों गंवानी पड़ती. लोगों को इसका जवाब चाहिए.’